जब आप महिलाओं के स्वास्थ्य के बारे में सोचते हैं, तो शायद दिल की बिमारी सबसे पहले आपके दिमाग़ में नहीं आता. लेकिन इसके बारे में सोचने की कई वज़ह हैं.
दिल की बीमारी अमेरिका में महिलाओं की मौत का सबसे बड़ा कारण है और यह किसी भी उम्र की महिला की बॉडी पर असर डाल सकता है. असल में, यह हर पाँच में से एक महिला की मौत का कारण बनता है. इसके अलावा, रिसर्च से पता चलता है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में दिल का दौरा पड़ने के बाद मौत के चांस ज़्यादा होते हैं.
अब जब Oura अपने हार्ट की हेल्थ के नए फ़ीचर लॉन्च कर रहा है, तो यह जानना बहुत ज़रूरी है कि हार्ट की हेल्थ पुरुषों और महिलाओं की बॉडी पर अलग-अलग तरह से असर डालती है—और कुछ तरीक़े तो वाकई चौंकाने वाले हैं.
महिलाओं के हार्ट की हेल्थ से जुड़ी कुछ पुरानी और ज़रूरी बातें
20वीं सदी के ज़्यादातर समय में, मेडिकल कम्युनिटी ने महिलाओं की बॉडी में होने वाली कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों को काफ़ी हद तक नज़रअंदाज़ किया. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले दिल की बिमारी को सिर्फ़ ‘पुरुषों की बीमारी’ माना जाता था, एक ऐसी समस्या जिसकी चिंता महिलाओं को अपनी बॉडी के लिए करने की ज़रूरत नहीं थी.
1980 के दशक में, अमेरिका की पहली बड़ी और लंबी कार्डियोवैस्कुलर स्टडी फ्रेमिंघम हार्ट स्टडी ने यह रिपोर्ट करना शुरू किया कि पुरुषों और महिलाओं की बॉडी में दिल की बिमारी के पैटर्न अलग-अलग होते हैं. इसमें यह भी पाया गया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में हार्ट अटैक की पहचान होने के चांस बहुत कम थे.
इसके बाद 2001 में एक ऐतिहासिक स्टडी आई, जिसने बताया कि क्लिनिकल ट्रायल में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है. इसी वज़ह से आगे चलकर ऐसी माँग उठी कि कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च में महिलाओं को शामिल किया जाए, उनकी बॉडी के हिसाब से अलग गाइडलाइन बनें और जागरूकता बढ़ाने के लिए कैंपेन चलाए जाएँ.
हालाँकि 21वीं सदी में महिलाओं की दिल की बिमारी को समझने की दिशा में काफ़ी तरक्की हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ जानना बाकी है, साथ ही रिसर्च में मौजूद बड़े गैप को भरना भी अभी बाकी है: कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के क्लिनिकल ट्रायल के एक सिस्टेमैटिक रिव्यू के मुताबिक, रिसर्च में शामिल लोगों में महिलाओं की संख्या सिर्फ़ 27% थी. यही नहीं, सिर्फ़ 33% स्टडी में ही यह बताया गया कि पुरुषों और महिलाओं की बॉडी पर इसके नतीज़े अलग-अलग कैसे रहे.
नीचे महिलाओं में दिल की बीमारी से जुड़े 7 ऐसे फैक्ट दिए गए हैं जो आपको ज़रूर जानने चाहिए. साथ ही उन लक्षणों को समझें जिन्हें आपकी बॉडी दिखा सकती है और जानें कि आप अपना रिस्क कम करने के लिए क्या कर सकती हैं.
महिलाओं में दिल की बिमारी के बारे में 7 फ़ैक्ट
1. महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों से मरने का जोख़िम हाई होता है.
हालाँकि पुरुषों में कार्डियोवैस्कुलर बिमारी ज़्यादा पाई जाती है, लेकिन महिलाओं में मौत का ख़तरा हाई होता है और उनकी रिकवरी के चांस भी पुरुषों के मुकाबले ख़राब होते हैं.
इन अंतरों के पीछे अलग-अलग और उलझे हुए कारण हैं, जिनमें से कुछ ये हैं:
- जैसा कि ऊपर बताया गया है, इतिहास में क्लिनिकल ट्रायल (दवाओं के टेस्ट) में महिलाओं के हिस्सा लेने की कमी रही है
- जागरूकता की कमी: 2019 में, सिर्फ़ 44% महिलाओं ने दिल की बिमारी को मौत का सबसे बड़ा कारण माना.
- महिलाओं की बॉडी में दिल की बिमारी के लक्षणों को अक्सर गलत समझा जाता है या उनकी गलत पहचान की जाती है
- महिलाओं में दिल की बिमारी के बारे में डॉक्टरों को जानकारी की कमी: एक नेशनल सर्वे में यह बात सामने आई है कि सिर्फ़ 22% फैमिली डॉक्टर और 42% हार्ट स्पेशलिस्ट ही यह मानते हैं कि वे महिलाओं की बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर से जुड़े जोख़िमों की सही पहचान करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
- महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दिल की बीमारी के लिए जान बचाने वाले इलाज, जैसे कि हार्ट ट्रांसप्लांट, मिलने के चांस कम होते हैं, या उन्हें स्टेटिन जैसी दवाएँ भी कम दी जाती हैं.
2. महिलाओं की बॉडी में दिल की बिमारी के लक्षण पुरुषों के मुकाबले काफ़ी अलग हो सकते हैं.
हालाँकि पुरुषों और महिलाओं दोनों में सीने में दर्द और सांस फूलने जैसे ‘क्लासिक’ लक्षण दिख सकते हैं, लेकिन महिलाओं की बॉडी में ये संकेत अक्सर काफ़ी अलग होते हैं, जिन्हें पहचानना मुश्किल हो सकता है. इसकी वज़ह से अक्सर बीमारी की गलत पहचान हो जाती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है.
दरअसल, एक स्टडी में पाया गया कि दिल का दौरा पड़ने पर महिलाओं के गलत इलाज़ होने और उन्हें अस्पताल से घर भेज दिए जाने के चांस पुरुषों के मुकाबले सात गुना ज़्यादा होते है.
चाहे आप महिला हों या आपके जीवन में कोई प्रिय महिला हो, महिलाओं में दिल की बिमारी के ख़ास लक्षण जानना ज़रूरी है, जिनमें ये शामिल हो सकते हैं:
- गर्दन, जबड़े, कंधे, पीठ के ऊपरी हिस्से या पेट के ऊपरी हिस्से में बेचैनी
- एक या दोनों हाथों में दर्द
- मतली या उल्टी
- पसीना आना
- सिर हल्का महसूस होना या चक्कर आना
- अजीब सी थकान महसूस होना
- हार्टबर्न या अपच
अगर आप या आपका कोई जानने वाला अपनी बॉडी में इनमें से कोई भी लक्षण महसूस कर रहा है, तो बिना डरे जितनी जल्दी हो सके डॉक्टर से संपर्क करें.
3. महिलाओं में हार्मोनल बदलाव से कार्डियोवैस्कुलर से जुड़े जोख़िम बढ़ सकते हैं.
किसी महिला की ज़िंदगी में ऐसा कोई भी पड़ाव, जो उसके हार्मोन लेवल पर बहुत बड़ा असर डालता है, उसकी बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क के ख़तरे को बढ़ा सकता है. उदाहरण के लिए, मेनोपॉज़ के दौरान, एस्ट्रोजन (जो एक कार्डियोप्रोटेक्टिव हार्मोन है) का लेवल कम हो जाता है. माना जाता है कि यही एक बड़ी वज़ह है कि मेनोपॉज़ के दौरान और उसके बाद महिलाओं की बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर से जुड़े इवेंट ज़्यादा देखने को मिलती हैं.
मासिक चक्र में होने वाली गड़बड़ी—चाहे वह दिनों की संख्या हो, ड्यूरेशन हो या समय—इसका सीधा संबंध आपकी बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर बिमारी के बढ़ते खतरे से हो सकता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये बदलाव आमतौर पर हार्मोन में गड़बड़ी की वज़ह से आते हैं.
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4. प्रेगनेंसी में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क बढ़ सकती है.
2023 की एक स्टडी के मुताबिक, प्रेगनेंसी महिला की बॉडी पर काफ़ी स्ट्रेस डालती है. यह एक ‘कार्डिएक स्ट्रेस टेस्ट’ की तरह काम करती है, जो ट्रेडिशनल रिस्क फ़ैक्टर दिखने से पहले ही यह बता देती है कि भविष्य में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज (CVD) का ख़तरा कितना है. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन प्रेगनेंसी को “होने वाली कमज़ोरी का पीरियड” कहता है, जिससे भविष्य में CVD होने का ख़तरा बढ़ सकता है.
प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली परेशानियाँ भी महिला की बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के ख़तरे को काफ़ी बढ़ा देती हैं. जिन महिलाओं को प्री-एक्लेम्पसिया, प्रीटर्म डिलीवरी, प्रेगनेंसी लॉस या जेस्टेशनल डायबिटीज़ होती है, उनमें इन कॉम्प्लीकेशन के बिना वाली महिलाओं की तुलना में CVD का ख़तरा हाई होता है.
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5. महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियाँ होने के चांस ज़्यादा होते हैं, जो उनकी बॉडी में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के ख़तरे को बढ़ा सकती हैं.
महिलाओं की बॉडी में ऑटोइम्यून बीमारियाँ होने के चांस कहीं ज़्यादा होते है; सच तो यह है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में इसका ख़तरा चार गुना तक ज़्यादा होता है. जिन महिलाओं को रूमेटाइड अर्थराइटिस या ल्यूपस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियाँ होती हैं, उनकी बॉडी में हार्ट की बीमारी होने का ख़तरा भी काफी बढ़ जाता है.
6. महिलाओं का दिल मानसिक या इमोशनल स्ट्रेस के मामले में कहीं ज़्यादा संवेदनशील होता है.
वैसे तो मेंटल स्ट्रेस किसी को भी परेशान कर सकता है, लेकिन रिसर्च बताती है कि स्ट्रेस का असर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के दिल पर कहीं ज़्यादा गहरा और गंभीर होता है.
एक हालिया रिसर्च में पाया गया है कि स्ट्रेस के हाल में, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की बॉडी की छोटी धमनियाँ ज़्यादा सिकुड़ने और खिंचने लगती हैं. ये वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो दिल से पूरी बॉडी तक खून पहुँचाती हैं.
शायद यही वज़ह है कि बहुत ज़्यादा स्ट्रेस होने पर महिलाओं की बॉडी में ‘टाकोत्सुबो सिंड्रोम’ होने के चांस ज़्यादा होते हैं, जिसे ‘ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम’ भी कहा जाता है.
7. महिलाएँ अपना जोखिम कम कर सकती हैं.
अच्छी बात ये है: महिलाओं में होने वाली दिल की बीमारियों को काफ़ी हद तक रोका जा सकता है. हकीकत तो यह है कि रिसर्च के मुताबिक, दिल की बीमारी और स्ट्रोक जैसी 80% कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों को हेल्दी आदतों के ज़रिए रोका जा सकता है और यहाँ तक कि अपनी बॉडी को वापस पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है.
बचाव की शुरुआत सही जानकारी से होती है. अपनी हार्ट की हेल्थ के लिए जागरूक रहकर, हेल्दी लाइफ़स्टाइल चुनकर और समय-समय पर डॉक्टर को दिखाकर, किसी भी उम्र की महिलाएँ अपनी बॉडी और दिल की सेहत का ख्याल रखने के लिए और भी ज़्यादा सशक्त बन सकती हैं.
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दिल की बिमारी का जोख़िम कम करने के 5 टिप्स

1. अपने स्टैट्स जानें
Oura जैसे पहनने वाले डिवाइस की मदद से अपनी हार्ट रेट को ट्रैक करना काफ़ी मददगार हो सकता है. एक महिला की बॉडी के लिए नॉर्मल हार्ट रेट 60 से 100 बीट्स प्रति मिनट (bpm) के बीच हो सकती है. हालाँकि यह आम सीमा से थोड़ा नीचे है, महिला Oura मेंबर की औसत हार्ट रेट 58 bpm है.
2. अपने खाने को बेहतर बनाएँ.
प्रोसेस्ड फूड, मीठे ड्रिंक और बहुत हाई चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट वाली चीज़ों को कम से कम खाएँ, ताकि आपकी बॉडी अंदर से हेल्दी रहे. इसके बजाय, मेडिटेरेनियन स्टाइल डाइट चुनें जिसमें पौधों से मिले खाने के सामान, मछली, और हेल्थी फैट खूब होते हैं.
3. रोज़ाना एक्सरसाइज़ करें.
हर हफ़्ते कम से कम 150 मिनट की मीडियम-इंटेंसिटी वाली एरोबिक फ़िजिकल एक्टिविटी या 75 से 150 मिनट की हाई-इंटेंसिटी वाली एरोबिक फ़िजिकल एक्टिविटी करने का लक्ष्य रखें. हफ़्ते में दो या उससे ज़्यादा दिन, मीडियम या हाई इंटेंसिटी पर कुछ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी शामिल करें.
4. तंबाकू और शराब का इस्तेमाल कम करने की कोशिश करें.
स्मोकिंग कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों की एक बड़ी वज़ह है—स्मोकिंग करने वाली महिलाओं में, स्मोकिंग करने वाले पुरुषों के मुकाबले दिल की बीमारी होने का ख़तरा 25% ज़्यादा होता है, जो उनकी बॉडी पर और भी बुरा असर डालता है. शराब पीने से भी इसी तरह हार्ट की हेल्थ पर असर पड़ता है, इसलिए बेहतर है कि आप दोनों का सेवन मॉडरेट अमाउंट में करें या पूरी तरह से बंद कर दें.
5. स्ट्रेस को मैनेज करें.
कहना आसान है पर करना मुश्किल, फिर भी अच्छी नींद, रोज़ाना एक्सरसाइज़, मेडिटेशन और अपनों से जुड़े रहकर अपने स्ट्रेस को कंट्रोल करने की कोशिश करें—यह आपकी बॉडी के लिए बहुत ज़रूरी है.
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